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- Written by: भीमसिंह
- Category: ARTICLES
पूरा विश्व प्रेस/मीडिया कश्मीर में आग भरी उत्तेजक कहानियां प्रकाशित कर रहा है। यह वास्तविकता है कि 26 अक्टूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के शासक ने भारत संघ के साथ जम्मू-कश्मीर का विलय किया था। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रसिद्ध लेखकों, न्यायविदों और राजनेताओं ने जम्मू-कश्मीर राज्य की पिछली ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की खोज करने की कोशिश नहीं की। जम्मू-कश्मीर के पाक-अधिकृत क्षेत्र (पीओके) की 4500 वर्ग मील भूमि पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा चल रहा है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान ने 13 अगस्त, 1948 में राष्ट्रसंघ के युद्धविराम प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये और उसके बाद गिलगित-बल्तिस्तान की लगभग 32,000 वर्ग मील भूमि पर आक्रमण करके कब्जा कर लिया। इसके अलावा गिलगित क्षेत्र में लगभग 5500 वर्ग मील भूमि को 1963 में पाकिस्तान ने चीन को 99 साल के लिए लीज पर दे दी और यह कब्जा गिलगित पर 13 अगस्त, 1948 के राष्ट्रसंघ के उस प्रस्ताव का उल्लंघन था, जिस पर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के सामने हलफनामा दिया था कि वह उसके आदेश की अवहेलना नहीं करेगा। गिलगित-बल्तिस्तान आज तक पाकिस्तान के कब्जे में है, जिसे पाकिस्तान ने अपना एक अधिकारिक प्रांत घोषित कर लिया है।
यहां यह जानना आवश्यक है कि पाकिस्तान ने 1948 में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत पर हमला किया था, जिसकी पूरी दुनिया के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र ने भी भत्र्सना की थी। यह भी जानना जरूरी है कि यह पाकिस्तान ही था, भारत नहीं, जिसने संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का उल्लंघन करके गैरकानूनी कब्जा किया। संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव दिनांक 05.01.1949 में पाकिस्तान ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था और घोषणा की थी कि वह अपने सभी सैनिकों (सशस्त्र बलों) के साथ-साथ उन नागरिकों को भी वापस लेगा जो पाकिस्तान द्वारा राज्य के बाहर लाये गये थे।
5 जनवरी, 1949 के दिन पास किये गये संयुक्त राष्ट्र आयोग की बैठक में 10 अंकों के प्रस्ताव को भारत और पाकिस्तान ने माना था और पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के 10 अंकों के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करके यह माना था कि वह जम्मू-कश्मीर (भारत) से कोई युद्ध नहीं करेगा। इसके बावजूद भी पाकिस्तान ने अपने सैनिकों और उन लोगों को वापस नहीं लिया, जिन्हें पाक-अधिकृत में बसाया था। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्रसंघ का यह आदेश भी मानने के बजाय अपनी सेना को इन क्षेत्रों से वापस नहीं किया और यह बात संयुक्त राष्ट्रसंघ के भेजे हुए प्रतिनिधि जज ओवन डिक्सन ने अपनी रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्रसंघ को लिखकर दिया था कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर या गिलगित से अपनी सेनाओं को वापस करने के लिए तैयार नहीं था और न ही बाहर के लोगों को अधिकृत कश्मीर से वापस लेना चाहता था। इसके बाद जज ओवन डिक्सन ने एक सोचीसमझी साजिश के तहत रिपोर्ट पेश कर दी, जिसे एंग्लो-अमेरिकन का पूरा समर्थन था। ओवन डिक्सन ने यह बात विश्व के सामने रखी कि जम्मू-कश्मीर को विभाजित किया जाय और कश्मीर का बड़ा हिस्सा और जम्मू के कुछ टुकड़ों को मिलाकर ‘ग्रेटर कश्मीर‘ बना दिया जाय, जि इस सुझाव का विरोध भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने किया था। यही कारण है कि 1965 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रस्तावों को मानने से इन्कार कर दिया।
इसके साथ यह जानना भी जरूरी है कि 1963 में पाकिस्तान ने एक समझौता करके गिलगित क्षेत्र में चीन को अवैध रूप से कब्जा करने की अनुमति दे दी। चीन ने उस कब्जे वाले क्षेत्र में 50 से अधिक सैन्य हेलीपैड का निर्माण किया है और चीन की राजधानी पेकिंग को पेशावर से जोड़ने में सफल रहा है और गिलगित के भारतीय क्षेत्र के माध्यम से पेकिंग से पेशावर तक अपना सड़कमार्ग स्थापित किया। चीन (पेकिंग) से सड़कमार्ग से यूरोप जाने का कोई भी रास्ता नहीं था। यह इतिहास में पहली बार है कि पाकिस्तान ने भारत की जमीन को चीन को पट्टे में देकर सैनिक सड़क बनाने का अवसर दिया है। आश्चर्य चीन कब्जे के कारण नहीं है, आश्चर्य संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के उल्लंघन का है और फिर संयुक्त राष्ट्र की चुप्पी के कारण कि वह 13.08.1948 के प्रस्ताव के उल्लंघन के खिलाफ क्यों खामोश रहा। यह पाकिस्तान था, जिसने जम्मू-कश्मीर के पूरे कब्जाए क्षेत्रों से अपने सशस्त्र बलों और निवासियों को वापस लेने के बजाय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का खुल्लमखुला उल्लंघन किया है। संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के उल्लंघन से जम्मू-कश्मीर के एक-तिहाई से अधिक क्षेत्र पर पाकिस्तान का गैरकानूनी कब्जा जारी है, जो 26 अक्टूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के शासक द्वारा हस्ताक्षरित विलयपत्र के अनुसार भारतीय क्षेत्र हैं और समय आ गया है कि जब भारत इस मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ के सामने उठाए।
भारत का विभाजन होकर पाकिस्तान बना और जनरल सर डगलस ग्रेसी ने असंगठित पाकिस्तान सेना के कमांडर-इन-चीफ के रूप में पदभार संभाला, जबकि लॉर्ड माउंटबेटन भारत के गवर्नर-जनरल थे। पाकिस्तान ने 14 अगस्त, 1947 को अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, जबकि भारत ने 15 अगस्त 1947 को। जम्मू-कश्मीर के शासक द्वारा भारत के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद भी पाकिस्तान ने 20 अक्टूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर (भारत) पर हमला कर दिया। भारत पर हमला करने के लिए पाकिस्तान के प्रस्ताव का तत्कालीन पाकिस्तान के सैन्य मामलों के प्रभारी जनरल सर डगलस ग्रेसी ने भी इनकार किया था। भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने मोहम्मद अली जिन्ना को अवगत कराया था कि आतंक या हिंसा जम्मू-कश्मीर समस्या का हल नहीं है।
संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के बाद पाकिस्तान ने गिलगित-बल्तिस्तान पर हमला करके हथिया लिया, जो जम्मू-कश्मीर का क्षेत्रीय भाग था। 1957 में भारत के प्रतिनिधि श्री कृष्ण मेनन ने अपने 8 घंटे से अधिक के ऐतिहासिक भाषण के दौरान सुरक्षा परिषद के पटल पर इन प्रस्तावों के सम्बंध में पाकिस्तान की साजिशों को उजागर किया था। यह केवल कृष्णा मेनन के भाषण के कारण हुआ था, जिससे पाकिस्तान की साजिशों का पर्दाफाश हो सका। इसके बाद कुछ वर्षों तक जम्मू-कश्मीर में शांति रही।
जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की कार्रवाई भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत थी, जो अन्तराष्ट्रीय कानून के अनुसार भी थी। जम्मू-कश्मीर के इस विलय को अधिक समर्थन मिला, जब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का उल्लंघन किया। पाकिस्तान को स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि वह गिलगित-बल्तिस्तान और अधिकृत कश्मीर को खाली करेगा और पाकिस्तान के बसाए हुए अधिकृत जम्मू-कश्मीर के निवासियों को वापस लेगा। यहां पर प्रश्न उठता था कि चीन भी इस प्रस्ताव को स्वीकार करे और गिलगित की 5500 वर्गमील भूमि को खाली करके वापस लौटे। चीन जम्मू-कश्मीर की जमीन को खाली नहीं करना चाहता था जो एक बहुत बड़ा कारण था कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में एक स्थायी सदस्य (चीन) का लगातार समर्थन मिलता रहा है। यही कारण था कि पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का उल्लंघन किया और भारत ने लगातार यह बात राष्ट्रसंघ के सामने दोहराने की कोशिश की।
आज प्रश्न यह है कि भारत को इस स्थिति में जम्मू-कश्मीर के बारे में क्या कदम उठना चाहिए, जिसे 1947 में वहां के महाराजा ने ब्रिटिश संसद के बनाए हुए कानून के तहत भारत के साथ जोड़ दिया था। यह भी बात साफ है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रस्ताव जो जम्मू-कश्मीर जनमत संग्रह कराने के हित में थे, उन्हें पाकिस्तान ने खुद खत्म कर दिया है। इस बात संयुक्त राष्ट्रसंघ के पैरोकार आस्टेªलियन जज और संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रयवेक्षक ओवन डिक्सन ने स्वयं स्वीकार किया था कि संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रस्ताव चाहे वह 13 अगस्त, 1948 का था या 5 जनवरी, 1948 का, उसे 1951 में लागू नहीं किया जा सकता था और इसे समर्थन था एंग्लो अमेरिकन धड़े का, क्योंकि वियतनाम और कोरिया से अमेरिका को हटना ही था और उसे चीन पर दबाव बनाने के लिए अपनी सैनाओं के लिए कुछ जमीन की जरूरत थी। एंग्लो अमेरिकन धड़ा आज भी इस सोच में है कि कश्मीर को भारत से अलग करके एक नया कैम्प बनाया जाय ताकि अमेरिका की फौजें चीन पर नजर रखने में सफल हो सकें।
आज भारतीय संसद के पास एक ही रास्ता है कि जम्मू-कश्मीर के भारतीय नागरिकों की रक्षा करने और भारत को उग्रवाद से बचाने का, जो यह कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में कम से कम संशोधन करने का संसद को अधिकार मिले। अनुच्छेद 370 के तहत संसद को तीन विषयों रक्षा, विदेशी मामले, संचार और संबद्ध मामले पर भी कानून बनाने का अधिकार प्राप्त नहीं है, जो तीन विषय 26 अक्टूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरिसिंह ने विलयपत्र पर हस्ताक्षर करके भारत के सौंपे थे। ये अधिकार भारतीय संसद के है, जो तुरंत संसद के सौंपने होंगे। भारत के राष्ट्रपति को अनुच्छेद 370 में जो आज तक अस्थायी है, संशोधन या कोई भी संशोधन करने का संवैधानिक अधिकार है। यही एक रास्ता है जम्मू-कश्मीर में भारत का तिरंगा कन्याकुमारी से कश्मीर तक बिना किसी रुकावट के फहराया जा सकता है। 70 सालों से अनुच्छेद 370 अस्थायी प्रावधान है और 370 में कोई भी संशोधन करने से भारतीय संसद अपने पर स्वयं रोक लगाती है।
यही एक रास्ता है जब जम्मू-कश्मीर में भारत का संविधान भी दौड़ेगा, भारत का तिरंगा कश्मीर से कन्याकुमारी तक लहरेगा और सबसे बड़ी उपलब्घि यह होगी कि जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को मौलिक अधिकार प्राप्त होंगे, जो भारतीय संविधान के अध्याय-3 में दर्ज हैं। यह खेद की बात है कि जम्मू-कश्मीर के भारतीय नागरिक, जिसमें लेखक भी शामिल है, उन्हें आज तक मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं हो सके हैं। जम्मू-कश्मीर में भारतीय दंड संहिता भी लागू नहीं है, वहां पर रनवीर पीनल कोड लागू होता है। जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के नियंत्रण के लिए जनसुरक्षा कानून बनाया हुआ है, जिस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखा जा सकता है। यह लेखक 1977 में कांग्रेस का विधायक होने के बावजूद भी जम्मू-कश्मीर के जनसुरक्षा कानून के तहत तीन साल तक जेलों में रहा है और बिना मुकदमा चलाए आठ साल से ज्यादा जम्मू-कश्मीर की जेलों का मजा चखा है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 25 बार इस लेखक को जम्मू-कश्मीर की जेलों से रिहा करने के आदेश दिये। इस लेखक के कई साथी और पूर्व विधायक कितने ही मुकदमों में फंसाए गए हैं। कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार को पैंथर्स पार्टी की महिला महासचिव को दो लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिये, जिन्हें 2007 में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मारा-पीटा और जेल में बंद किया था। इसके अलावा और भी कई पैंथर्स पदाधिकारियों को एक-एक लाख रुपये जम्मू-कश्मीर सरकार से मुआवजा दिलवाया था। इसी तरह कश्मीर में आज भी दो हजार छात्र, युवा और मासूम लोग जेलों में बंद हैं। जिसका कारण सिर्फ यह है कि भारत के संविधान में दिए गए मानवाधिकार जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हैं। जब तक भारतीय संविधान जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह लागू नहंी होगा, भारत का झंडा कन्याकुमारी से कश्मीर तक नहीं लहरेगा और हर व्यक्ति को न्याय-अधिकार नहीं मिलेगा तब तक जम्मू-कश्मीर में शांति असम्भव है।
भीम सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता
मुख्य संरक्षक, नेशनल पैंथर्स पार्टी,
वरिष्ठ कार्यकारी सदस्य, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन
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